आज़ादी विशेषांक / Freedom Special

अंक 13 / Issue 13

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किसी और भूगोल में / In Another Locale

फीचर्स / Features

हिन्दी पत्रकार-कथाकार अनिल यादव की भारत के पूर्वोत्तर की यात्रा कई तरह से विशिष्ट है – यह यात्रा ‘बेमकसद’ (पूर्वोत्तर से रिपोर्टिंग करके उत्तर-भारत के हिन्दी मीडिया में ‘स्टार’ बन जाने की विनम्र महत्वाकांक्षा को छोड़ दिया जाये तो) की गई, यात्रियों की जेबें लगभग खाली थीं और वे उत्तर-पूर्व के बारे में ‘लगभग कुछ नहीं’ जानते थे. वृतांत की यह पहली किस्त वहाँ समाप्त होती है जब यात्री उस देश पहुँचे पहुँचे भर हैं जहाँ ‘हरियाली का विस्फोट’ होता है.

किसी और भूगोल में बनते हुए आख्यानों के इस समुच्चय में इसके अतिरिक्त है भाश्वती का अपने दो अमेरिका प्रवासों के दौरान लिखा हुआ पाठ जो एक ‘इंटैलैक्चुअल डायरी’ की तरह विकसित होता है; चीन-यात्रा की स्मृति की ‘निजी’ प्रतिक्रियाओं का एक तरल जाल बनता हुआ प्रत्यक्षा का मोंताज और वियेना के छोटे कस्बों की विलक्षण मनुष्यहीनता और उनके विलक्षणतर सांस्कृतिक इतिहास को एक डे-बुक की संरचना में लिखता हुआ अशोक पांडे का गद्य.

Hindi journalist/story-writer Anil Yadav’s journey to the North-East of India is special in many ways — the trip was made “aimlessly” (if one discounts the humble ambition of becoming a star in the Hindi media by reporting from the North-East), the traveler’s pockets were almost empty, and he knew “almost nothing” about the North-East. This first installment of his travelogue ends at the point when he has just reached that country where there is an “explosion of greenery”.

Besides this, we have Bhashwati’s “intellectual diary” about her two trips to the USA, Pratyaksha’s montage of memories from her trip to China, and Ashok Pande’s piece, written as a “day-book”, about the astonishing absence of people in the Viennese countryside and the even more astonishing cultural history of the place.



पटनहिया पनरसिया

फीचर्स / Features

ग्रॉफिक गल्प अपेक्षाकृत नयी विधा है संसार की सभी भाषाओं में – भारत में भी ग्रॉफिक गल्प लिखने की कुछ शुरुआतें हुई हैं. प्रतिलिपि में हम भारत के पहले (अंग्रेज़ी) ग्रॉफिक नॉवेलिस्ट सारनाथ बनर्जी के एक उपन्यास का अंश हिन्दी अनुवाद में प्रकाशित कर चुके हैं. यहाँ प्रस्तुत प्रमोद सिंह/नितिन कुशवाहा की ग्रॉफिक कथा इस अर्थ में तो अनूठी है ही कि यह द्विभाषी/बहुभाषी है बल्कि इसलिये भी कि यह ग्रॉफिक गल्प के विधान को देसी अंदाज और विट से अपहृत कर लेती है.

Graphic fiction is a relatively new medium, in all languages — some attempts have been made even in India in this direction. At Pratilipi, we have previously published (in Hindi translation) an excerpt from a novel by India’s first (English) graphic novelist. Here we present a graphic story by Pramod Singh and Nitin Kushwaha. What makes it special is not only that it is bi/multilingual, but also because it injects a dose of “desi” idiom and wit into the form.



एक कविता / Ek Kavita

फीचर्स / Features

इस नये फीचर में सिद्धांततः किसी भी भाषा की किसी भी समय में किसी के भी लिखी हुई किसी एक कविता पर कोई भी लिख सकता है – पहली पेशकश में शामिल हैं वॉलेस स्टीवेंस की कविता द स्नोमैन पर श्रीदला स्वामी, पोलिश कवि एडम ज़गायेवस्की की कविता आग पर गीत चतुर्वेदी, और हिन्दी कवि नवीन सागर की कविता निर्मल वर्मा की किताबें पर गिरिराज किराड़ू की टिप्पणियाँ.

This new feature aims to present a piece of writing about one poem from any time, place, language or poet. In its inaugural run, it features pieces by Sridala Swami on Wallace Stevens’ The Snow Man, Geet Chaturvedi on polish poet Adam Jagajewsky’s Fire and Giriraj Kiradoo on Hindi poet Naveen Sagar’s Nirmal Verma ki Kitaabein.



ओपन डिबेट / Open Debate

फीचर्स / Features

ओपन डिबेट में हर बार एक या अधिक ऐसे पाठ होंगे जिन पर हम पाठकों की प्रतिक्रियाएँ आमंत्रित और प्रकाशित करेंगे। इसकी शुरूआत हम जिन दो मज़मूनों से कर रहे हैं उनमें से पहला है डी. वेंकट राव का एनाक्रॉनिस्टिक रिफ्लेक्शन्सः ऑव् क्रिटिकल ह्यूमेनिटीज । ज्ञान के आधुनिक/औपनिवेशिक केन्द्र के रूप में ‘यूनिवर्सिटी’ और उसकी दार्शनिक बुनियाद ‘मानववाद’ पर शंका करता हुआ यह निबंध ‘जाति’ पर कथित ‘नेटिव’ प्रतिकथन भी करता है। यूनिवर्सिटी, मानववाद जैसे प्रत्ययों के अतिरिक्त उत्तर-औपनिवेशिक बुद्धिजीवन की कथित छलना/असफलता भी निबंध के निशाने पर है।

दूसरा है हिंदी के आधुनिक महाकवि निराला के उत्तराधिकार पर व्योमेश शुक्ल का निबंध. हिंदी में साहित्यिक उत्तराधिकार बहुत पेचीदा और विवादस्पद मसला रहा है. व्योमेश का निबंध भी, अपनी तरह से, निराला के उत्तराधिकार को लेकर विवाद-सक्षम है.

दोनों मज़मूनों पर लिखित प्रतिक्रियाएँ आमंत्रित हैं। प्रतिलिपि इस श्रृंखला में प्रकाशित किसी पाठ की, पत्रिका की समस्त सामग्री की ही तरह, प्रवक्ता नहीं है। हम अलोकप्रिय होने का खतरा उठाने और पोलिटिकली करेक्ट मुहावरे से बाहर जा के बोलने के साहस की तारीफ़ जरूर कर सकते हैं और करते हैं।

Open Debate is a new feature wherein we will present one or more texts on which we will invite and publish responses from our readers. We start with two pieces. The first is D. Venkat Rao’s Anachronistic Reflections: Of Critical Humanities. Problematizing the University as a colonial/modern center of knowledge, the piece also takes a supposedly ‘native’ position on a phenomenon like caste.

The other is an essay by Vyomesh Shukla on the great, modern, Hindi poet Nirala. The question of legacy, especially in Hindi Literature, is a very complex and controversial issue. Vyomesh’s essay, in its own way, adds to the debate about Nirala’s legacy.

We invite responses from our readers on both texts. Like every other text in the magazine, the texts presented here do not necessarily represent Pratilipi’s views. We do, however, applaud the courage of authors who take the risk of speaking in an idiom that may not be politically correct, or the risk of becoming unpopular.



किताबत / Kitabat

फीचर्स / Features

किताबत के इस संस्करण में गैब्रिएल गार्सिया मार्क्वेज़ के उपन्यास माय मेलॅन्कलि व्होर्स पर तेजी ग्रोवर; हॉर्पर कालिंस इंडिया द्वारा पुनर्प्रकाशन के अवसर पर हिन्दी कवि-कथाकार ज्योत्सना मिलन के उपन्यास अ अस्तु का पर प्रत्यक्षा; और शरतचंद्र के क्लैसिक बांगला उपन्यास देवदास पर गिरिराज किराड़ू का निबंध.

This issue of Kitabat features Teji Grover on Garcia Marquez’s Memories of my Melancholy Whores; Pratyaksha on Jyotsna Milan’s novel A Astu Ka on the occasion of its reissue by Harper Collins India; and Giriraj Kiradoo on Sharat Chandra’s classic Bengali novelDevdas.



लोक-प्रिय / Lok-Priy

फीचर्स / Features

लोक-प्रिय में इस बार का खास आकर्षण है शरतचंद्र के मिथकीय उपन्यास देवदास का हिन्दी अनुवाद में एक अंश। मूल बांग्ला से यह ताज़ा अनुवाद चर्चित युवा हिन्दी कथाकार कुणाल सिंह कर रहे हैं और उन्होंने जहाँ तहाँ कुछ सृजनात्मक रूपान्तरण भी किया है।

इसके अतिरक्त है भूतनाथ की कहानी सावन आये या ना आये जिसमें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का समकालीन परिसर ययाति और पुरुरवा, देवयानी और शर्मिष्ठा की पौराणिक-मिथकीय छायाओं से घिर जाता है और फिल्म अभिनेता, गीतकार, संगीतकार और स्क्रीन राईटर पीयूष मिश्रा से वरूण ग्रोवर की बातचीत खुद उन्हीं के अंग्रेज़ी अनुवाद में.

The main attraction of this edition of Lok-priy is an excerpt from a new translation of Sharat Chandra’s iconic novel Devdas by the young Hindi writer Kunal Singh.

Besides this, we also have the story Saavan Aaye ya na Aaye by Bhootnath, in which the shades of the mythic characters Yayati, Pururava, Devyani and Sharmishtha gather in the contemporary campus of Benaras Hindu University, and Varun’s interview (translated into English) with actor/screenwriter/lyricist/music-director Piyush Mishra.



निराला का उत्तराधिकार: व्योमेश शुक्ल

कथेतर / Non-Fiction

निराला का स्मरण मुश्किल है। उनकी स्मृति उनकी उपस्थिति की ही तरह मायावी है और पर्याप्त वैचारिक, कलात्मक, नैतिक और मानसिक दिक़्क़तें पेश करती हैं। मसलन यही दिक़्क़त कि वह स्मृति है या उपस्थिति, या यही कि निराला के प्रसंग में स्मृति और उपस्थिति का इतना स्याह-सफ़ेद विभाजन मुमकिन या जायज़ है। एक तरफ पाठ्यक्रमों-शोधों-अनुसंधानों-संस्थानों-समारोहों […]



दस हंगारी कवि

कविता / Poetry

मिक्लोश राद्नोती बृहस्पतिवार न्यूयॉर्क के एक छोटे से होटल में ‘टी’ ने फंदा लपेट लिया गर्दन में बरसों भटकता रहा था वह बेवतन और भटक पाएगा वह? प्राग में ‘एम.जे.’ खुदकुशी कर ली, वह अपने देश भी निर्वासित था; और उस ‘आर.पी.’ ने – उसने भी नहीं लिखा एक साल से; लेटा है शायद सूखी […]



The Stone Leaves For The Street: Trina Nileena Banerjee

कविता / Poetry

Circles and the Boy The River, History Lavender goes the day. In the evening, curtains dropping over the river filth little boys bathed in mud, twisted black knots in their bellies. Underneath, the roots of the river grow old and flabby, bloating and turning red in the winter sun. This water’s molten gold spreads amply […]



Reader, Anti-reader and the Liberation of the Book: Madan Soni

कथेतर / Non-Fiction

Contemporary Italian critic and philosopher Umberto Eco’s novel The Name of the Rose is not a novel at all. In the modern period, there have been many novels which were claimed to be ‘non-novels’, but this particular novel does not belong to that category. It does not have any qualms about its being a novel, […]